Wednesday, 11 July 2018

दिलों के बीच दूरियां बढ़ा रहा है आरक्षण

आरक्षण एक ऐसा घुन है जो देश की योग्यता को किसी ना किसी रूप में खोखला करता जा रहा है। आप आरक्षण पर कई लेख पढ़ चुके होंगे लेकिन आज बात करते हैं एक अलग मुद्दे पर। आज आरक्षण कई प्रतिभाओं को मारने के साथ साथ लोगों के दिलों के बीच दूरियां भी बढ़ाता जा रहा है। जातिगत आरक्षण देश की विभिन्न जातियों के बीच दूरियां बढ़ाता ही जा रहा है। आज हर जाति आरक्षण पाना चाहती है और इसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार है। अजीब विडम्बना है कि अपने आप को निचली जाति का कहलाना कोई पसंद नहीं करेगा लेकिन आरक्षण पाने की होड़ में सब निम्न वर्ग में जाने को तैयार बैठे हैं।
       आरक्षण पाने के लिये आज धरना प्रदर्शन से लेकर हिंसात्मक उपद्रव तक किया जा रहा है। देश की कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने से भी लोग नहीं चूक रहे हैं। कोई भी आरक्षण समाप्त करने के लिए धरना नहीं देना चाहता बल्कि आरक्षण पाने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार है। सभी जातियाँ अपना अपना समूह बनाकर आरक्षण पाने की होड़ में आगे निकलना चाहती हैं। उन्हें सिर्फ अपनी जाति के लिए आरक्षण चाहिए, बाकी लोगों का चाहे जो हो। सिर्फ अपना भला चाहने की इस होड़ में आपसी मेलजोल कम होता जा रहा है और दिलों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं। और अजीब बात ये है कि इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। किसी समान्य वर्ग के प्रतियोगी छात्र का चयन यदि किसी परीक्षा में नहीं हो पाता है तो उसके मन में आरक्षण प्राप्त वर्गों के प्रति घृणा बढ़ जाती है । और ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि ज्यादा अंक लाने पर भी वो उससे कम अंक लाने वाले आरक्षण प्राप्त वर्ग के छात्र से पीछे रह जाता है। आरक्षण ने कुछ लोगों की सोच को इतना कुंठित कर दिया है कि वे इससे उबरने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं। वे अपनी प्रतिभा को निखारने की जगह बस बैशाखियों का सहारा पकड़ कर चलना चाहते हैं। एक ही देश के एक जैसे लोगों के दिलों में खटास पैदा करने वाली एक सच्ची घटना का जिक्र मैं यहां करना चाहूंगा जोकि मेरे सामने की है---
        एक बार किसी परीक्षा के सिलसिले में मैं दूसरे शहर जाने के लिए स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था। मेरे पास ही कुछ और भी छात्र खड़े थे। थोड़ी देर में उन छात्रों के कुछ परिचित छात्र और आ गए जो शायद उन्हीं के साथ तैयारी करते होंगे। बातों ही बातों में नए आये छात्रों में से एक छात्र पहले से खड़े एक छात्र से बोला - “भाई तुम्हारा तो चयन हो चुका है पिछली परीक्षा में तो अब क्यों देने जा रहे हो, किसी और के लिए छोड़ दो किसी और को भी नौकरी मिल जाएगी” । इस पर पहले वाला वो छात्र जवाब देता है- “यार मेरा चयन मेरे आरक्षित कोटे से हुआ है, वो तो मेरा है ही। अब मैं समान्य वर्ग से भर्ती होऊंगा और वो सीट अपने आरक्षित वर्ग के किसी और लड़के के लिए छोड़ दूंगा” ।
       इतनी सी बात सुनकर और उसकी ऐसी नीच सोच जानकर मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन क्या किया जा सकता है ऐसे लोगों का जब सारा तंत्र ही खराब है। आरक्षण बनाया गया था निचले वर्ग को ऊपर उठाने के लिए, और जब बनाया गया था तो उस समय इसकी जरूरत भी थी और उपयोगिता भी लेकिन आज के समय में आरक्षण का काम पूरा हो चुका है। अब आरक्षण जाति के आधार पर ना होकर आर्थिक आधार पर होना चाहिए। ऐसा करने से समाज के हर वर्ग को मौका मिलेगा चाहे वो किसी भी जाति का हो। जातिगत आरक्षण जब तक रहेगा तब तक देश जातियों में बंटता रहेगा और कुछ जाति दूसरी जातियों से घृणा करती रहेंगी।
        अब सरकार को आरक्षण समाप्त करने की ओर कदम उठाने चाहिए और ये काम सभी राजनीतिक दलों को करना होगा क्योंकि किसी एक पार्टी से ये नहीं होने वाला है। इसकी वजह है वोट बैंक। जब कभी भी कोई एक दल ऐसा करना चाहेगा तो दूसरे दल अपने वोट बैंक के चक्कर में ऐसा नहीं होने देंगे। इसलिए सभी दलों को एक साथ बैठकर इसका समाधान खोजना चाहिए। लेकिन ऐसा हो पाना मुश्किल है क्योंकि नेताओं की तो मौज आ रही है चाहे वो किसी भी जाति का हो। अगर परेशान है तो वो है आम आदमी और नेताओं को उससे कोई मतलब है नहीं। लोग ऐसे ही एक दूसरे से लड़ते रहेंगे और एक दूसरे को ऊंचा नीचा समझते रहेंगे। आज जबकि सारा संसार आगे बढ़कर कुछ नया करने को आतुर है और एक दूसरे से लोग कुछ नया सीखने और सिखाने पर बल दे रहे हैं, देशों के बीच दूरियां कम हो रही हैं, हमारे देश में दिलों के बीच की ये खाई बढ़ती जा रही है। और तो औऱ चुनाव भी विकास की बजाय जाति के आधार पर लड़ा जाता है। सब लोगों को एक समान समझने के लिए इस जातिगत आरक्षण को समाप्त करना ही होगा।

Monday, 7 May 2018

देश मे प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति

भारत में प्राथमिक विद्यालय खोले गए ताकि गरीब वर्ग को उचित शिक्षा मिल सके। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए ये विद्यालय वरदान साबित हुए हैं। सरकार को शायद आभास रहा होगा कि भारत की अधिकांश जनता अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में नहीं भेज सकती। उन स्कूलों में भेजने के लिए एक बच्चे की इतनी फीस चाहिए कि उससे पूरे परिवार का पेट पाला जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे पीछे ना रह जाएं यही सोचकर सरकार ने ऐसे विद्यालय खोलने पर जोर दिया जहाँ कम या बेहद कम शुल्क में बच्चे शिक्षा ग्रहण कर सकें। सरकार की इस सोच को इन विद्यालयों ने भी बल दिया है। उत्तम कोटि की शिक्षा प्रदान करने में ये विद्यालय पीछे नहीं रहे। यहां के शिक्षकों ने अपनी योग्यता का परिचय देते हुए बच्चों का शैक्षिक के साथ साथ मानसिक विकास  भी किया। उन्होंने कभी ये नहीं सोचा कि वे सिर्फ एक नौकरी कर रहे हैं और पैसे कमाना ही उनका ध्येय है। वे सभी को अपना बच्चा समझकर शिक्षा देते थे और समाज का उत्थान व बच्चों का विकास ही उनका लक्ष्य होता था। विद्यालय के समय के बाद भी वे बच्चों को पढ़ा दिया करते थे। मुझे अभी भी याद है कि मेरे विद्यालय के एक शिक्षक शाम को मेरे दादा जी के पास आया करते थे और उसी समय मुझे भी पढ़ाया करते थे और मुझे मन मारकर एक घंटे के लिए फिर से किताबें खोलनी पड़ती थीं। लेकिन उस समय का अनुशासन आज अपना असर दिखा रहा है। आज मुझे बेहद खुशी है कि ऐसे शिक्षकों का सान्निध्य मुझे प्राप्त हुआ।
                लेकिन आज सिथति काफी बदल चुकी है। इन प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर इतना गिर चुका है कि इनमें पढ़े हुए बच्चों से उम्मीद करना कि वो आगे कुछ बनके दिखाएंगे, अमावस्या की रात में जुगनू की रोशनी में कुछ ढूंढ़ने जैसा है। अपवाद तो हर जगह होते हैं लेकिन ऐसे बच्चों के कौशल में इन विद्यालयों का योगदान ना के बराबर होता है। इसका कारण कुछ हद तक सरकारी नीतियां भी हैं। आजकल के शिक्षकों का मूल उद्देश्य जैसे तैसे नौकरी पाकर पैसा कमाना रह गया है, बच्चे चाहे पढ़े या ना पढें। पहले शिक्षक किसी बच्चे के ना आने पर उसके घर जाकर उसे बुलाकर लाते थे या कुछ बच्चों जो भेजकर उसे बुलवाते थे (वे ये छूट भी देते थे कि चाहे कैसे भी लाना पड़े, बांधकर या पकड़कर, लेकर ही आना है)। और आज शिक्षक ये सोचते हैं कि बच्चे ना आएं तो बेहतर है, स्कूल जल्दी बंदकर घर जाने को मिलेगा। कुछ शिक्षकों की योग्यता के बारे मे आप इंटरनेट पर आसानी से देख सकते है कि वे बच्चों को क्या सिखाते होंगे। उन्हें सामान्य जानकारी का भी ज्ञान नही होता है। आजकल स्मार्टफोन तो लगभग सभी के पास हैं। अपने फोन में गंदी फिल्में रखना और खाली समय में देखना कुछ शिक्षकों की आदत में शुमार है। छुट्टियों के तो ये इतने भूखे होते हैं कि पूरे साल बस छुट्टियां ही छुट्टियां मिलें चाहे पढ़ाई हो या ना हो।
                दिनोंदिन कम होती जा रही बच्चों की संख्या प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति दर्शाने को पर्याप्त है। गाँव में जो लोग थोड़े भी सम्पन्न हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजना पसंद करते हैं। ऐसा नहीं है कि प्राथमिक विद्यालय बेकार हैं लेकिन एक या दो योग्य अध्यापकों के भरोसे इच्छित उन्नति कर पाना कछुए की चाल जैसा है। इन विद्यालयों का स्तर सुधारने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। एक उपाय जो कारगर साबित हो सकता है वो ये कि प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ना बड़े बड़े नेताओं और अधिकारियों के बच्चों के लिए अनिवार्य किया जाए। नेताओं और अधिकारियों के बच्चे बड़े शहरों के अच्छे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं और प्राथमिक विद्यालय सिर्फ गरीबों और किसानों के बच्चों के लिए रह जाते हैं।
               ऐसा करने से देश के नीति निर्माता करीब से इन विद्यालयों की स्थिति को समझ पाएंगे। शिक्षक भी बच्चों पर अधिक ध्यान देंगे और विद्यालय तथा शिक्षा के स्तर में भी व्यापक सुधार होगा। मजबूरी में ही सही लेकिन शिक्षकों को मन लगाकर पढ़ाना पड़ेगा। बच्चों में एक दूसरे को ऊंचा नीचा समझने की आदत नहीं पड़ेगी। गरीब बच्चों को भी उचित माहौल मिल सकेगा जो शायद ही अभी मिल पाता होगा। लेकिन सोचने का विषय ये है कि क्या ऐसा हो पायेगा ? शायद नहीं, क्योंकि अच्छी वस्तु को प्राप्त सभी करना चाहते हैं लेकिन किसी खराब वस्तु को अच्छा बनाने का प्रयास करना कोई नहीं चाहता। और जब ढेरों विकल्प मौजूद हों तो कौन आगे आना चाहेगा। अपने देश के नेताओं का स्तर और मानसिकता तो सभी को ज्ञात ही है। एक दूसरे की बुराई करके अपना उल्लू सीधा करने से फुरसत मिले तो कुछ और सोचने की कोशिश भी करें। लेकिन इस देश का नागरिक कभी आस नहीं छोड़ेगा और यही उसकी ताकत भी है। अंत में यही कहना चाहूंगा कि अगर किसी प्रयास से कुछ अच्छा होता है तो उसे करने में देर  नहीं करनी चाहिए। जय हिंद….….