Wednesday, 8 July 2020

बॉयकाट की आवश्यकता ही क्यों ? अपने देश में क्यों नहीं बन सकती चीजें..

जब भी सीमा पर तनाव होता है विशेष रूप से चीन के साथ,  एक शब्द जो पूरे देश में छाया रहता है वो है बॉयकाट। आखिर इस सबकी आवश्यकता ही क्यों पड़ती है, क्यों हम लोग कुछ ऐसा नहीं करते कि बॉयकाट की नौबत ही ना आए। हम लोग अपनी सुविधाओं के लिए दूसरों पर इतने निर्भर हो चुके हैं कि इस बात का ध्यान ही नहीं आता कि हम भी वैसा कुछ कर सकते हैं। हमें अपनी सहूलियत तो चाहिए लेकिन दूसरों के भरोसे। अब अगर कोई दूसरा सुविधा देगा तो वो अपने हिसाब से अपनी शर्तों पर ही तो ऐसा करेगा। अपने देश में चीनी सामान इतनी अच्छी तरह पैठ बना चुका है कि उससे बचना मुश्किल होता जा रहा है । चाहे मोबाइल हो या लैपटॉप या कोई ई-कॉमर्स कंपनी यहाँ तक कि दिवाली पर इस्तेमाल होने वाली लाइटें, हर जगह चीन घुसा हुआ है। कहीं मोबाइल बनाने वाली कंपनी ही चीन की है तो कहीं भरतीय कंपनी में लगने वाला पैसा चीन का है। चीन बहुत ही होशियारी से सभी देशों के बाजार पर कब्ज़ा करता जा रहा है। वो किसी क्षेत्र में अपनी कंपनी उतारने में देर नहीं करता और अगर ऐसा करने में कोई मुश्किल आती है तो जिस देश के बाज़ार पर वो कब्ज़ा करना चाहता है वहाँ की कंपनियों में अपना पैसा लगा देता है। मनमुटाव होने पर दूसरे देश के लोग एक ओर तो बॉयकाट करने की कोशिश करते हैं और दूसरी ओर उस देश की अर्थव्यवस्था चरमराने का डर रहता है क्योंकि चीन उस देश के बाज़ार में काफी अन्दर तक घुस चुका होता है।
               इस समय भारत और चीन के बीच मनमुटाव जोरों पर है। चीन भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण करने से बाज नहीं आ रहा है और भारत भी उपयुक्त जवाब दे रहा है। भारत में इस समय चीन के खिलाफ डिजिटल बॉयकाट चल रहा है और सरकार ने भी चीन के कई एप्स पर रोक लगा दी है। लेकिन यहाँ एक सवाल ये उठता है कि हमें बॉयकाट की आवश्यकता ही क्यों होती है ? क्या अपने देश में अमीर उद्योगपतियों और हुनर की कोई कमी है ? बिल्कुल नहीं। भारत एक ऐसा देश है जहाँ प्रतिभा की कोई कमी नहीं है और एशिया के सबसे अमीर उद्योगपतियों की सूची में भी भारत सबसे ऊपर है। तो क्यों नहीं भारत में भी चीनी मोबाइल कंपनियों की तुलना में कोई कंपनी अच्छे मोबाइल बनाती है। टिकटॉक और शेयरइट जैसे ऍप्लिकेशन्स भारत में क्यों नहीं बन सकते हैं…? वैसे देखा जाए तो इसमें जनता भी काफी हद तक जिम्मेदार है क्योंकि लोग अपने देश  का बना मोबाइल खरीदना नहीं चाहते। उन्हें विदेशी कंपनियों के मोबाइल ज्यादा पसंद आते हैं। भारतीय समाज का एक खास वर्ग तो ऐसा है कि उसे इन सब चीजों से कोई मतलब ही नहीं है। उसके पास भरपूर पैसा है और वो महँगे विदेशी सामान खरीदने में अपनी शान समझता है। उसे देश के हालातों से कोई सरोकार नहीं है, उसका बस एक ही उद्देश्य है पैसा कमाना और खर्च करना।
                  स्वदेशी कंपनियों से जनता की बेरुखी के लिए केवल जनता ही जिम्मेदार नहीं है, इसके लिए स्वदेशी कंपनियां भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। लोगों को जितनी अच्छी सेवा विदेशी कंपनियां देती हैं उतनी देश की कंपनी नहीं दे पाती। चीन की नीतियाँ और माहौल ऐसा है कि लगभग हर कंपनी वहाँ से अपने प्रोडक्ट बनवाना चाहती है। भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता….. बिल्कुल कर सकता है बस यहाँ के नेताओं को थोड़ा सा सुधरने की जरूरत है। उन्हें अपने पेट से पहले देश पर ध्यान देना होगा। सरकार कंपनियों के लिए उचित माहौल और नीतियाँ बनाए। 
                   अपने देश की प्रतिभा यहाँ की बजाय दूसरे देशों में काम करना पसंद करती है क्योंकि वहाँ पैसा ज्यादा मिलता है और सुविधायें भी। अगर कोई यहाँ कुछ करना भी चाहे तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ता है चाहे वो पैसों की तंगी हो या सरकारी लालफीताशाही और भ्रष्टाचार। एक है जो अपने स्तर पर ये सब अच्छे तरीके से कर सकता है वो है भारत सरकार क्योंकि सरकार के पास पैसा भी होता है, सारा नियंत्रण भी होता है। भारत सरकार को एक ऐसा विभाग बनाना चाहिए जो हर तरह के डिजिटल प्रोडक्ट बनाये। देश के अच्छे आईटी विशेषज्ञों को चुनकर एक ऐसी टीम तैयार होनी चाहिए जो टिक टॉक, शेयर इट, फेसबुक, ट्विटर जैसे प्रसिद्ध ऐप्प और वेबसाइट बना सके। ये हैरानी की बात है कि भारत दुनिया भर में आईटी हब के रूप में प्रसिद्ध है और यहाँ के लोग विदेशी एप्प पसंद करते हैं। भारत में कोई भयंकर वायरल एप्प क्यों नहीं बनता…..? अगर देश में अच्छी चीजें बनेंगी तो ना विदेशी चीजों की आदत पड़ेगी और ना ही बॉयकाट की नौबत आएगी।

Friday, 3 July 2020

क्यों ना उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जाए ......!

किसी व्यक्ति की संवेदनायें इस हद तक कैसे मर सकती हैं ? कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है ? ये कुछ सवाल हर उस व्यक्ति के मन में उठे जो दूसरे जीवों के प्रति थोड़ी भी दया रखता है और अब सब शांत हो गया। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ केरल की उस घटना की जहाँ एक हथिनी को विस्फोटक से भरा फल खिलाया गया और उसे खाते ही वो उसके मुँह में फट गया। इसका परिणाम ये हुआ कि उस हथिनी का मुँह अंदर से बुरी तरह जख्मी हो गया और वो दर्द और जलन से इस हद तक तड़प उठी कि जलन शांत करने के लिए नदी में जाकर खड़ी हो गई। कुछ समय तक पानी में खड़े रहने के बाद उसने अपने प्राण त्याग दिए। जरा सोचिए कि उसे कितनी पीड़ा हुई होगी कि वो पानी में खड़े रहने पर मजबूर हुई। इस निर्दयता पर गुस्सा तब और बढ़ गया जब पता चला कि वो गर्भवती थी। उसके साथ इतना क्रूर मज़ाक किया गया कि उसके साथ साथ उसके बच्चे की भी जान ले ली गई। इस घटना से यह भी साबित हो जाता है कि शिक्षा का संस्कारों से कोई लेना देना नहीं है। केरल भारत का सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य है और ऐसे राज्य में इतनी क्रूर घटना हो, ये उस राज्य के लिए घोर निंदा का विषय है और साथ ही साथ उम्मीद से परे है।
              यह एक ही घटना नहीं थी जो उस समय घटी थी, कुछ ही समय बाद ऐसी ही क्रूर घटना का समाचार हिमाचल प्रदेश से सुनने को मिला जहाँ एक गाय को विस्फोटक खिलाया गया। इस विस्फोटक की तीव्रता इतनी थी कि इसे खाते ही गाय का जबड़ा फट गया। उस गाय की क्या गलती रही होगी कि उसे इतनी बड़ी सजा मिली ? बस इतनी कि उसने इंसानों पर भरोसा करके वो चीज खा ली । ये तो ऐसी घटनाएं थीं जो एकदम से प्रकाश में आ गईं। ना जाने कितनी ही ऐसी क्रूरताएँ होंगी जिनके बारे में लोगों को पता भी नहीं चलता। संसार का सबसे बुद्धिमान जीव होते हुए भी मनुष्य ऐसी जघन्यता जानवरों के साथ आखिर क्यों करता है…… भोजन के लिए या मनोरंजन के लिए। दूसरे जीव की हत्या करना दुष्टता तो है ही चाहे पेट भरने के लिए ही क्यों ना हो लेकिन सिर्फ चंचल मन की शान्ति के लिए किसी जीव के साथ ऐसी जघन्यता दिखाना एक अक्षम्य पाप होना चाहिए। ऐसी घटनाओं पर क्रोध मिश्रित आश्चर्य होता है कि लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं...। और अगर बुद्धिमान जीव को दूसरे जीवों के प्रति किसी भी तरह की संवेदना नहीं है तो उसे पशु ही समझा जाना चाहिए।
                 अब एक सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी घटनाएं रुक नहीं सकतीं….? ये तो निर्भर करता है स्वयं मनुष्यों पर कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। अगर लोग दूसरों के बारे में भी सोचना शुरू कर दें तो उन्हें उचित-अनुचित का ज्ञान तो हो ही जायेगा। बाकी लोगों की जागरूकता से ऐसी घटनाएं कम तो हो सकती हैं लेकिन बिल्कुल बन्द हो जाएं ये शायद सम्भव नहीं है क्योंकि कई लोग कुछ इस तरह के होते हैं कि उन्हें किसी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके मन में एक शैतान बैठा होता है जिससे उन्हें दूसरे जीवों को सताने में मज़ा आता है। ऐसे लोगों का कुछ नहीं हो सकता। बस एक सजा जो उनके लिए उचित है वो ये की उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जाए जैसा वो दूसरों के साथ करते हैं। जैसे- जो कोई भी उस हथिनी का दोषी है उसे पकड़कर पहले उसके मुँह में विस्फोटक फोड़ा जाए और फिर उसे किसी नदी में खड़ा किया जाए जिससे उसे भी उस पीड़ा का अनुभव हो जिससे वो हथिनी गुजरी होगी। इससे ऐसे लोगों को एहसास होगा कि बेवजह दूसरों को पीड़ा देकर कैसा लगता है। इस पर कुछ लोग मानवाधिकार हनन जैसा कुछ ज्ञान पेलेंगे, तो ऐसे लोगों को उठाकर कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाए क्योंकि ये लोग किसी काम के नहीं हैं। ऐसी जगह मानवाधिकार जैसी कोई चीज काम नहीं करती जहाँ सामने वाला उसकी खुलकर धज्जियाँ उड़ा रहा हो।
              ना तो आज वो समय है और ना ही ऐसे लोग हैं कि आँखें मूँदकर किसी के प्रति ज्यादा दया दिखाई जाए क्योंकि उन लोगों को अपने अलावा किसी और की भावनाओं से कोई मतलब ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि सभी लोग बुरे हैं, अच्छे भी हैं लेकिन बहुत कम। जो अच्छे लोग होते हैं ना वो ऐसा करते ही नहीं हैं। इसमें ज्यादा सोचने की कोई बात है ही नहीं, अच्छे लोगों के लिए मानवाधिकार वाली भावना जीवित कर लो और बाकी तो आप समझ ही गए होंगे।