भारत में प्राथमिक विद्यालय खोले गए ताकि गरीब वर्ग को उचित शिक्षा मिल सके। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए ये विद्यालय वरदान साबित हुए हैं। सरकार को शायद आभास रहा होगा कि भारत की अधिकांश जनता अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में नहीं भेज सकती। उन स्कूलों में भेजने के लिए एक बच्चे की इतनी फीस चाहिए कि उससे पूरे परिवार का पेट पाला जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे पीछे ना रह जाएं यही सोचकर सरकार ने ऐसे विद्यालय खोलने पर जोर दिया जहाँ कम या बेहद कम शुल्क में बच्चे शिक्षा ग्रहण कर सकें। सरकार की इस सोच को इन विद्यालयों ने भी बल दिया है। उत्तम कोटि की शिक्षा प्रदान करने में ये विद्यालय पीछे नहीं रहे। यहां के शिक्षकों ने अपनी योग्यता का परिचय देते हुए बच्चों का शैक्षिक के साथ साथ मानसिक विकास भी किया। उन्होंने कभी ये नहीं सोचा कि वे सिर्फ एक नौकरी कर रहे हैं और पैसे कमाना ही उनका ध्येय है। वे सभी को अपना बच्चा समझकर शिक्षा देते थे और समाज का उत्थान व बच्चों का विकास ही उनका लक्ष्य होता था। विद्यालय के समय के बाद भी वे बच्चों को पढ़ा दिया करते थे। मुझे अभी भी याद है कि मेरे विद्यालय के एक शिक्षक शाम को मेरे दादा जी के पास आया करते थे और उसी समय मुझे भी पढ़ाया करते थे और मुझे मन मारकर एक घंटे के लिए फिर से किताबें खोलनी पड़ती थीं। लेकिन उस समय का अनुशासन आज अपना असर दिखा रहा है। आज मुझे बेहद खुशी है कि ऐसे शिक्षकों का सान्निध्य मुझे प्राप्त हुआ।
लेकिन आज सिथति काफी बदल चुकी है। इन प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई का स्तर इतना गिर चुका है कि इनमें पढ़े हुए बच्चों से उम्मीद करना कि वो आगे कुछ बनके दिखाएंगे, अमावस्या की रात में जुगनू की रोशनी में कुछ ढूंढ़ने जैसा है। अपवाद तो हर जगह होते हैं लेकिन ऐसे बच्चों के कौशल में इन विद्यालयों का योगदान ना के बराबर होता है। इसका कारण कुछ हद तक सरकारी नीतियां भी हैं। आजकल के शिक्षकों का मूल उद्देश्य जैसे तैसे नौकरी पाकर पैसा कमाना रह गया है, बच्चे चाहे पढ़े या ना पढें। पहले शिक्षक किसी बच्चे के ना आने पर उसके घर जाकर उसे बुलाकर लाते थे या कुछ बच्चों जो भेजकर उसे बुलवाते थे (वे ये छूट भी देते थे कि चाहे कैसे भी लाना पड़े, बांधकर या पकड़कर, लेकर ही आना है)। और आज शिक्षक ये सोचते हैं कि बच्चे ना आएं तो बेहतर है, स्कूल जल्दी बंदकर घर जाने को मिलेगा। कुछ शिक्षकों की योग्यता के बारे मे आप इंटरनेट पर आसानी से देख सकते है कि वे बच्चों को क्या सिखाते होंगे। उन्हें सामान्य जानकारी का भी ज्ञान नही होता है। आजकल स्मार्टफोन तो लगभग सभी के पास हैं। अपने फोन में गंदी फिल्में रखना और खाली समय में देखना कुछ शिक्षकों की आदत में शुमार है। छुट्टियों के तो ये इतने भूखे होते हैं कि पूरे साल बस छुट्टियां ही छुट्टियां मिलें चाहे पढ़ाई हो या ना हो।
दिनोंदिन कम होती जा रही बच्चों की संख्या प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति दर्शाने को पर्याप्त है। गाँव में जो लोग थोड़े भी सम्पन्न हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजना पसंद करते हैं। ऐसा नहीं है कि प्राथमिक विद्यालय बेकार हैं लेकिन एक या दो योग्य अध्यापकों के भरोसे इच्छित उन्नति कर पाना कछुए की चाल जैसा है। इन विद्यालयों का स्तर सुधारने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। एक उपाय जो कारगर साबित हो सकता है वो ये कि प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ना बड़े बड़े नेताओं और अधिकारियों के बच्चों के लिए अनिवार्य किया जाए। नेताओं और अधिकारियों के बच्चे बड़े शहरों के अच्छे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं और प्राथमिक विद्यालय सिर्फ गरीबों और किसानों के बच्चों के लिए रह जाते हैं।
ऐसा करने से देश के नीति निर्माता करीब से इन विद्यालयों की स्थिति को समझ पाएंगे। शिक्षक भी बच्चों पर अधिक ध्यान देंगे और विद्यालय तथा शिक्षा के स्तर में भी व्यापक सुधार होगा। मजबूरी में ही सही लेकिन शिक्षकों को मन लगाकर पढ़ाना पड़ेगा। बच्चों में एक दूसरे को ऊंचा नीचा समझने की आदत नहीं पड़ेगी। गरीब बच्चों को भी उचित माहौल मिल सकेगा जो शायद ही अभी मिल पाता होगा। लेकिन सोचने का विषय ये है कि क्या ऐसा हो पायेगा ? शायद नहीं, क्योंकि अच्छी वस्तु को प्राप्त सभी करना चाहते हैं लेकिन किसी खराब वस्तु को अच्छा बनाने का प्रयास करना कोई नहीं चाहता। और जब ढेरों विकल्प मौजूद हों तो कौन आगे आना चाहेगा। अपने देश के नेताओं का स्तर और मानसिकता तो सभी को ज्ञात ही है। एक दूसरे की बुराई करके अपना उल्लू सीधा करने से फुरसत मिले तो कुछ और सोचने की कोशिश भी करें। लेकिन इस देश का नागरिक कभी आस नहीं छोड़ेगा और यही उसकी ताकत भी है। अंत में यही कहना चाहूंगा कि अगर किसी प्रयास से कुछ अच्छा होता है तो उसे करने में देर नहीं करनी चाहिए। जय हिंद….….