आरक्षण एक ऐसा घुन है जो देश की योग्यता को किसी ना किसी रूप में खोखला करता जा रहा है। आप आरक्षण पर कई लेख पढ़ चुके होंगे लेकिन आज बात करते हैं एक अलग मुद्दे पर। आज आरक्षण कई प्रतिभाओं को मारने के साथ साथ लोगों के दिलों के बीच दूरियां भी बढ़ाता जा रहा है। जातिगत आरक्षण देश की विभिन्न जातियों के बीच दूरियां बढ़ाता ही जा रहा है। आज हर जाति आरक्षण पाना चाहती है और इसके लिए वो कुछ भी करने को तैयार है। अजीब विडम्बना है कि अपने आप को निचली जाति का कहलाना कोई पसंद नहीं करेगा लेकिन आरक्षण पाने की होड़ में सब निम्न वर्ग में जाने को तैयार बैठे हैं।
आरक्षण पाने के लिये आज धरना प्रदर्शन से लेकर हिंसात्मक उपद्रव तक किया जा रहा है। देश की कानून व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करने से भी लोग नहीं चूक रहे हैं। कोई भी आरक्षण समाप्त करने के लिए धरना नहीं देना चाहता बल्कि आरक्षण पाने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार है। सभी जातियाँ अपना अपना समूह बनाकर आरक्षण पाने की होड़ में आगे निकलना चाहती हैं। उन्हें सिर्फ अपनी जाति के लिए आरक्षण चाहिए, बाकी लोगों का चाहे जो हो। सिर्फ अपना भला चाहने की इस होड़ में आपसी मेलजोल कम होता जा रहा है और दिलों के बीच दूरियां बढ़ती जा रही हैं। और अजीब बात ये है कि इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं है। किसी समान्य वर्ग के प्रतियोगी छात्र का चयन यदि किसी परीक्षा में नहीं हो पाता है तो उसके मन में आरक्षण प्राप्त वर्गों के प्रति घृणा बढ़ जाती है । और ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि ज्यादा अंक लाने पर भी वो उससे कम अंक लाने वाले आरक्षण प्राप्त वर्ग के छात्र से पीछे रह जाता है। आरक्षण ने कुछ लोगों की सोच को इतना कुंठित कर दिया है कि वे इससे उबरने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं। वे अपनी प्रतिभा को निखारने की जगह बस बैशाखियों का सहारा पकड़ कर चलना चाहते हैं। एक ही देश के एक जैसे लोगों के दिलों में खटास पैदा करने वाली एक सच्ची घटना का जिक्र मैं यहां करना चाहूंगा जोकि मेरे सामने की है---
एक बार किसी परीक्षा के सिलसिले में मैं दूसरे शहर जाने के लिए स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था। मेरे पास ही कुछ और भी छात्र खड़े थे। थोड़ी देर में उन छात्रों के कुछ परिचित छात्र और आ गए जो शायद उन्हीं के साथ तैयारी करते होंगे। बातों ही बातों में नए आये छात्रों में से एक छात्र पहले से खड़े एक छात्र से बोला - “भाई तुम्हारा तो चयन हो चुका है पिछली परीक्षा में तो अब क्यों देने जा रहे हो, किसी और के लिए छोड़ दो किसी और को भी नौकरी मिल जाएगी” । इस पर पहले वाला वो छात्र जवाब देता है- “यार मेरा चयन मेरे आरक्षित कोटे से हुआ है, वो तो मेरा है ही। अब मैं समान्य वर्ग से भर्ती होऊंगा और वो सीट अपने आरक्षित वर्ग के किसी और लड़के के लिए छोड़ दूंगा” ।
इतनी सी बात सुनकर और उसकी ऐसी नीच सोच जानकर मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन क्या किया जा सकता है ऐसे लोगों का जब सारा तंत्र ही खराब है। आरक्षण बनाया गया था निचले वर्ग को ऊपर उठाने के लिए, और जब बनाया गया था तो उस समय इसकी जरूरत भी थी और उपयोगिता भी लेकिन आज के समय में आरक्षण का काम पूरा हो चुका है। अब आरक्षण जाति के आधार पर ना होकर आर्थिक आधार पर होना चाहिए। ऐसा करने से समाज के हर वर्ग को मौका मिलेगा चाहे वो किसी भी जाति का हो। जातिगत आरक्षण जब तक रहेगा तब तक देश जातियों में बंटता रहेगा और कुछ जाति दूसरी जातियों से घृणा करती रहेंगी।
अब सरकार को आरक्षण समाप्त करने की ओर कदम उठाने चाहिए और ये काम सभी राजनीतिक दलों को करना होगा क्योंकि किसी एक पार्टी से ये नहीं होने वाला है। इसकी वजह है वोट बैंक। जब कभी भी कोई एक दल ऐसा करना चाहेगा तो दूसरे दल अपने वोट बैंक के चक्कर में ऐसा नहीं होने देंगे। इसलिए सभी दलों को एक साथ बैठकर इसका समाधान खोजना चाहिए। लेकिन ऐसा हो पाना मुश्किल है क्योंकि नेताओं की तो मौज आ रही है चाहे वो किसी भी जाति का हो। अगर परेशान है तो वो है आम आदमी और नेताओं को उससे कोई मतलब है नहीं। लोग ऐसे ही एक दूसरे से लड़ते रहेंगे और एक दूसरे को ऊंचा नीचा समझते रहेंगे। आज जबकि सारा संसार आगे बढ़कर कुछ नया करने को आतुर है और एक दूसरे से लोग कुछ नया सीखने और सिखाने पर बल दे रहे हैं, देशों के बीच दूरियां कम हो रही हैं, हमारे देश में दिलों के बीच की ये खाई बढ़ती जा रही है। और तो औऱ चुनाव भी विकास की बजाय जाति के आधार पर लड़ा जाता है। सब लोगों को एक समान समझने के लिए इस जातिगत आरक्षण को समाप्त करना ही होगा।