जब भी सीमा पर तनाव होता है विशेष रूप से चीन के साथ, एक शब्द जो पूरे देश में छाया रहता है वो है बॉयकाट। आखिर इस सबकी आवश्यकता ही क्यों पड़ती है, क्यों हम लोग कुछ ऐसा नहीं करते कि बॉयकाट की नौबत ही ना आए। हम लोग अपनी सुविधाओं के लिए दूसरों पर इतने निर्भर हो चुके हैं कि इस बात का ध्यान ही नहीं आता कि हम भी वैसा कुछ कर सकते हैं। हमें अपनी सहूलियत तो चाहिए लेकिन दूसरों के भरोसे। अब अगर कोई दूसरा सुविधा देगा तो वो अपने हिसाब से अपनी शर्तों पर ही तो ऐसा करेगा। अपने देश में चीनी सामान इतनी अच्छी तरह पैठ बना चुका है कि उससे बचना मुश्किल होता जा रहा है । चाहे मोबाइल हो या लैपटॉप या कोई ई-कॉमर्स कंपनी यहाँ तक कि दिवाली पर इस्तेमाल होने वाली लाइटें, हर जगह चीन घुसा हुआ है। कहीं मोबाइल बनाने वाली कंपनी ही चीन की है तो कहीं भरतीय कंपनी में लगने वाला पैसा चीन का है। चीन बहुत ही होशियारी से सभी देशों के बाजार पर कब्ज़ा करता जा रहा है। वो किसी क्षेत्र में अपनी कंपनी उतारने में देर नहीं करता और अगर ऐसा करने में कोई मुश्किल आती है तो जिस देश के बाज़ार पर वो कब्ज़ा करना चाहता है वहाँ की कंपनियों में अपना पैसा लगा देता है। मनमुटाव होने पर दूसरे देश के लोग एक ओर तो बॉयकाट करने की कोशिश करते हैं और दूसरी ओर उस देश की अर्थव्यवस्था चरमराने का डर रहता है क्योंकि चीन उस देश के बाज़ार में काफी अन्दर तक घुस चुका होता है।
इस समय भारत और चीन के बीच मनमुटाव जोरों पर है। चीन भारतीय क्षेत्र में अतिक्रमण करने से बाज नहीं आ रहा है और भारत भी उपयुक्त जवाब दे रहा है। भारत में इस समय चीन के खिलाफ डिजिटल बॉयकाट चल रहा है और सरकार ने भी चीन के कई एप्स पर रोक लगा दी है। लेकिन यहाँ एक सवाल ये उठता है कि हमें बॉयकाट की आवश्यकता ही क्यों होती है ? क्या अपने देश में अमीर उद्योगपतियों और हुनर की कोई कमी है ? बिल्कुल नहीं। भारत एक ऐसा देश है जहाँ प्रतिभा की कोई कमी नहीं है और एशिया के सबसे अमीर उद्योगपतियों की सूची में भी भारत सबसे ऊपर है। तो क्यों नहीं भारत में भी चीनी मोबाइल कंपनियों की तुलना में कोई कंपनी अच्छे मोबाइल बनाती है। टिकटॉक और शेयरइट जैसे ऍप्लिकेशन्स भारत में क्यों नहीं बन सकते हैं…? वैसे देखा जाए तो इसमें जनता भी काफी हद तक जिम्मेदार है क्योंकि लोग अपने देश का बना मोबाइल खरीदना नहीं चाहते। उन्हें विदेशी कंपनियों के मोबाइल ज्यादा पसंद आते हैं। भारतीय समाज का एक खास वर्ग तो ऐसा है कि उसे इन सब चीजों से कोई मतलब ही नहीं है। उसके पास भरपूर पैसा है और वो महँगे विदेशी सामान खरीदने में अपनी शान समझता है। उसे देश के हालातों से कोई सरोकार नहीं है, उसका बस एक ही उद्देश्य है पैसा कमाना और खर्च करना।
स्वदेशी कंपनियों से जनता की बेरुखी के लिए केवल जनता ही जिम्मेदार नहीं है, इसके लिए स्वदेशी कंपनियां भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं। लोगों को जितनी अच्छी सेवा विदेशी कंपनियां देती हैं उतनी देश की कंपनी नहीं दे पाती। चीन की नीतियाँ और माहौल ऐसा है कि लगभग हर कंपनी वहाँ से अपने प्रोडक्ट बनवाना चाहती है। भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता….. बिल्कुल कर सकता है बस यहाँ के नेताओं को थोड़ा सा सुधरने की जरूरत है। उन्हें अपने पेट से पहले देश पर ध्यान देना होगा। सरकार कंपनियों के लिए उचित माहौल और नीतियाँ बनाए।
अपने देश की प्रतिभा यहाँ की बजाय दूसरे देशों में काम करना पसंद करती है क्योंकि वहाँ पैसा ज्यादा मिलता है और सुविधायें भी। अगर कोई यहाँ कुछ करना भी चाहे तो उसे परेशानियों का सामना करना पड़ता है चाहे वो पैसों की तंगी हो या सरकारी लालफीताशाही और भ्रष्टाचार। एक है जो अपने स्तर पर ये सब अच्छे तरीके से कर सकता है वो है भारत सरकार क्योंकि सरकार के पास पैसा भी होता है, सारा नियंत्रण भी होता है। भारत सरकार को एक ऐसा विभाग बनाना चाहिए जो हर तरह के डिजिटल प्रोडक्ट बनाये। देश के अच्छे आईटी विशेषज्ञों को चुनकर एक ऐसी टीम तैयार होनी चाहिए जो टिक टॉक, शेयर इट, फेसबुक, ट्विटर जैसे प्रसिद्ध ऐप्प और वेबसाइट बना सके। ये हैरानी की बात है कि भारत दुनिया भर में आईटी हब के रूप में प्रसिद्ध है और यहाँ के लोग विदेशी एप्प पसंद करते हैं। भारत में कोई भयंकर वायरल एप्प क्यों नहीं बनता…..? अगर देश में अच्छी चीजें बनेंगी तो ना विदेशी चीजों की आदत पड़ेगी और ना ही बॉयकाट की नौबत आएगी।