किसी व्यक्ति की संवेदनायें इस हद तक कैसे मर सकती हैं ? कोई इतना निर्दयी कैसे हो सकता है ? ये कुछ सवाल हर उस व्यक्ति के मन में उठे जो दूसरे जीवों के प्रति थोड़ी भी दया रखता है और अब सब शांत हो गया। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ केरल की उस घटना की जहाँ एक हथिनी को विस्फोटक से भरा फल खिलाया गया और उसे खाते ही वो उसके मुँह में फट गया। इसका परिणाम ये हुआ कि उस हथिनी का मुँह अंदर से बुरी तरह जख्मी हो गया और वो दर्द और जलन से इस हद तक तड़प उठी कि जलन शांत करने के लिए नदी में जाकर खड़ी हो गई। कुछ समय तक पानी में खड़े रहने के बाद उसने अपने प्राण त्याग दिए। जरा सोचिए कि उसे कितनी पीड़ा हुई होगी कि वो पानी में खड़े रहने पर मजबूर हुई। इस निर्दयता पर गुस्सा तब और बढ़ गया जब पता चला कि वो गर्भवती थी। उसके साथ इतना क्रूर मज़ाक किया गया कि उसके साथ साथ उसके बच्चे की भी जान ले ली गई। इस घटना से यह भी साबित हो जाता है कि शिक्षा का संस्कारों से कोई लेना देना नहीं है। केरल भारत का सबसे ज्यादा शिक्षित राज्य है और ऐसे राज्य में इतनी क्रूर घटना हो, ये उस राज्य के लिए घोर निंदा का विषय है और साथ ही साथ उम्मीद से परे है।
यह एक ही घटना नहीं थी जो उस समय घटी थी, कुछ ही समय बाद ऐसी ही क्रूर घटना का समाचार हिमाचल प्रदेश से सुनने को मिला जहाँ एक गाय को विस्फोटक खिलाया गया। इस विस्फोटक की तीव्रता इतनी थी कि इसे खाते ही गाय का जबड़ा फट गया। उस गाय की क्या गलती रही होगी कि उसे इतनी बड़ी सजा मिली ? बस इतनी कि उसने इंसानों पर भरोसा करके वो चीज खा ली । ये तो ऐसी घटनाएं थीं जो एकदम से प्रकाश में आ गईं। ना जाने कितनी ही ऐसी क्रूरताएँ होंगी जिनके बारे में लोगों को पता भी नहीं चलता। संसार का सबसे बुद्धिमान जीव होते हुए भी मनुष्य ऐसी जघन्यता जानवरों के साथ आखिर क्यों करता है…… भोजन के लिए या मनोरंजन के लिए। दूसरे जीव की हत्या करना दुष्टता तो है ही चाहे पेट भरने के लिए ही क्यों ना हो लेकिन सिर्फ चंचल मन की शान्ति के लिए किसी जीव के साथ ऐसी जघन्यता दिखाना एक अक्षम्य पाप होना चाहिए। ऐसी घटनाओं पर क्रोध मिश्रित आश्चर्य होता है कि लोग इतने संवेदनहीन कैसे हो सकते हैं...। और अगर बुद्धिमान जीव को दूसरे जीवों के प्रति किसी भी तरह की संवेदना नहीं है तो उसे पशु ही समझा जाना चाहिए।
अब एक सवाल यह उठता है कि क्या ऐसी घटनाएं रुक नहीं सकतीं….? ये तो निर्भर करता है स्वयं मनुष्यों पर कि उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। अगर लोग दूसरों के बारे में भी सोचना शुरू कर दें तो उन्हें उचित-अनुचित का ज्ञान तो हो ही जायेगा। बाकी लोगों की जागरूकता से ऐसी घटनाएं कम तो हो सकती हैं लेकिन बिल्कुल बन्द हो जाएं ये शायद सम्भव नहीं है क्योंकि कई लोग कुछ इस तरह के होते हैं कि उन्हें किसी तरह का कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके मन में एक शैतान बैठा होता है जिससे उन्हें दूसरे जीवों को सताने में मज़ा आता है। ऐसे लोगों का कुछ नहीं हो सकता। बस एक सजा जो उनके लिए उचित है वो ये की उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार किया जाए जैसा वो दूसरों के साथ करते हैं। जैसे- जो कोई भी उस हथिनी का दोषी है उसे पकड़कर पहले उसके मुँह में विस्फोटक फोड़ा जाए और फिर उसे किसी नदी में खड़ा किया जाए जिससे उसे भी उस पीड़ा का अनुभव हो जिससे वो हथिनी गुजरी होगी। इससे ऐसे लोगों को एहसास होगा कि बेवजह दूसरों को पीड़ा देकर कैसा लगता है। इस पर कुछ लोग मानवाधिकार हनन जैसा कुछ ज्ञान पेलेंगे, तो ऐसे लोगों को उठाकर कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाए क्योंकि ये लोग किसी काम के नहीं हैं। ऐसी जगह मानवाधिकार जैसी कोई चीज काम नहीं करती जहाँ सामने वाला उसकी खुलकर धज्जियाँ उड़ा रहा हो।
ना तो आज वो समय है और ना ही ऐसे लोग हैं कि आँखें मूँदकर किसी के प्रति ज्यादा दया दिखाई जाए क्योंकि उन लोगों को अपने अलावा किसी और की भावनाओं से कोई मतलब ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि सभी लोग बुरे हैं, अच्छे भी हैं लेकिन बहुत कम। जो अच्छे लोग होते हैं ना वो ऐसा करते ही नहीं हैं। इसमें ज्यादा सोचने की कोई बात है ही नहीं, अच्छे लोगों के लिए मानवाधिकार वाली भावना जीवित कर लो और बाकी तो आप समझ ही गए होंगे।
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